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भूटान के जिस प्रिंस ने जीता सबका दिल,वो नालंदा के शिक्षाविद का है पुनर्जन्म
नई दिल्ली,02/नवम्बर/2017(ITNN)>>>  भारत दौरे पर आए भूटान के नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल के सुपुत्र और भूटान के राजकुमार जिग्मे नामग्याल वांगचुक देश के शीर्ष नेताओं का दिल जीत रहे हैं। पीएम मोदी,राष्ट्रपति और विदेश मंत्री का अपनी मासूमियत से मन मोह लेने वाले भूटान के इस नन्हें प्रिंस को दरअसल एक शिक्षाविद विरोचना का पुनर्जन्म माना जाता है। भूटान में पुनर्जन्म को लेकर मान्यताएं बहुत मजबूत हैं और यह भी माना जाता है कि पूर्वजन्म में जिग्मे का सारनाथ से गहरा नाता रहा। 

जिग्मे को भूटान में 824 वर्ष पूर्व शिक्षाविद वेरोचना का पुनर्जन्म माना जाता है। कहा जाता है कि कि उन्हें अपने पूर्व जन्म की बातें याद हैं और वो नालंदा का जिक्र करते रहते हैं। इसी सिलसिले में उन्हें लेकर भूटान की रानी आशी दोरजी वांग्मो वांगचुक अपनी मां के साथ इस साल की शुरुआत में ही नालंदा आईं थीं। राजकुमार, रानी और नानी के साथ 5 जुलाई को सारनाथ में थे और सारनाथ के पुरातात्विक खंडहर परिसर,चौखंडी स्तूप,धमेख स्तूप को कभी गंभीरता से देखते तो कभी हंस देते। 

भगवान बुद्ध की प्रतिमा को देखते ही उसके शांत मुखमंडल पर खुशी की लकीरें खिंच गईं थीं। दल के साथ बोधगया भूटान बौद्ध मठ से आए भिक्षु येरो ने बताया कि जिग्मे जब थोड़ा बहुत बोलने लगे तब वो नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में ही बाते करते थे। जिग्मे ने 824 वर्ष पूर्व नालंदा में पढ़ने की बात बताई। उनकी हर बात 824 वर्ष पूर्व के शिक्षाविद् वेरोचना से मिलती थी। इस जन्म में उसका भूटान के शाही घराने में महारानी के नाती के रूप में जन्म हुआ है। 

जिग्मे अक्सर अपनी नानी से सारनाथ आने की इच्छा जताई थी। उसकी बातों को सुनकर महारानी ने बुद्ध से जुड़े स्थलों के दर्शन का निर्णय लिया। वह नालंदा विश्वविद्यालय के चप्पे चप्पे से वाकिफ है। जब वह नालंदा गए तो अपने कमरे तक पहुंच गए जहां पूर्वजन्म में रहते था। इतना ही नहीं, वहां उन्होंने वह मुद्राएं दिखाईं जो नालंदा के छात्रों को सिखाई जाती थीं।