आध्यात्म
गुरुवार व्रत से प्राप्त होते है धन और पुत्र
नई दिल्ली,20/अप्रैल/2017(ITNN)>>>>>>>  गुरुवार व्रत से दूर होते हैं वैवाहिक दोष और मिलती है आर्थिक समृद्धि। धार्मिक दृष्टि से गुरु यानि बृहस्पति देवगुरु हैं। वह ज्ञान के देवता भी माने जाते हैं। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार गुरु को व्यक्ति की किस्मत या भाग्य का निर्णायक भी माना गया है। गुरु को शुभ,सौम्य ग्रह माना जाता है।स्त्री-पुरुष दोनों के सुखद वैवाहिक जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

गुरु पुरुष तत्व का कारक है। इसलिए विशेषकर स्त्री के वैवाहिक विषयों में आ रही बाधाओं व पुरुषो को आ रही आर्थिक समस्या को दूर करने के लिए और गुरु की प्रसन्नता के लिए भी यह व्रत लोक परंपराओं में बहुत प्रचलित है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार गुरु ग्रह के शुभ प्रभाव वाले लोग विनम्र,प्रेमी और शांत व्यक्तित्व के धनी होते हैं। जिस माह के शुक्लपक्ष के दिन अनुराधा नक्षत्र और गुरुवार का संयोग बनें। उस दिन से गुरुवार का व्रत प्रारंभ करना चाहिए।

देवगुरु बृहस्पति की प्रतिमा को किसी पात्र में रखकर पीले वस्त्र,पीले फूल,चमेली के फूलों और अक्षत आदि से पूजन करें। यज्ञोपवितधारी पुरुष गुरु की पूजा-अर्चना के समय जनेऊ अवश्य धारण करें। पंचोपचार पूजा करें,भोग में पीली वस्तुओं या फलों को अर्पित करें। गुरु बृहस्पति से शुभ फल की प्राप्ति के लिए प्रार्थना कर उस दिन यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए या भोजन सामग्री दान देनी चाहिए। भोजन में चने से बने पदार्थ अवश्य हो। पीले रंग की वस्तु विशेषकर वस्त्र व धार्मिक पुस्तक अवश्य दान देना चाहिए। स्वर्णदान विशेष शुभ है जो शीघ्र फल देने वाला होता है। ब्रह्मभोज के बाद ही व्रती को भोजन करना चाहिए। ऐसे सात गुरुवार को अखंडित व्रत करना चाहिए। इससे गुरु ग्रह के कुण्डली में बने बुरे योग और दोष की शांति होती है और ग्रह बाधा नष्ट होती है। श्रेष्ठ वर-वधू प्राप्त होने के प्रबल संभावनाएं जगती हैं।

व्रत माहात्म्य एवं विधि
इस व्रत को करने से समस्त इच्छएं पूर्ण होती है और वृहस्पति महाराज प्रसन्न होते है। धन,विघा, पुत्र तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। परिवार में सुख तथा शांति रहती है। इसलिए यह व्रत सर्वश्रेष्ठ और अतिफलदायक है। इस व्रत में केले का पूजन ही करें। कथा और पूजन के समय मन,कर्म और वचन से शुद्घ होकर मनोकामना पूर्ति के लिये वृहस्पतिदेव से प्रार्थना करनी चाहिए। दिन में एक समय ही भोजन करें। भोजन चने की दाल आदि का करें, नमक न खाएं,पीले वस्त्र धारण करें,पीले चंदन से पूजन करें। पूजन के बाद भगवान वृहस्पति की कथा सुननी चाहिए।