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article on food and its misuse
साहित्य-संस्कृति
भोजन की बर्बादी एक त्रासदी है
ललित गर्ग
30/मार्च/2017(ITNN)>>>>>>>  हर रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संवेदनशील एवं सामाजिक हो जाते हैं। देश की जनता से ‘मन की बात’ करते हुए वे सामाजिक, पारिवारिक एवं व्यक्तिगत मुद्दों को उठाते है और जन-जन को झकझोरते हैं। इसी श्रंखला की ताजा कड़ी में देशवासियों को भोजन की बर्बादी के प्रति आगाह किया। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह पाठ पढ़ना जरूरी है। क्योंकि एक तरफ विवाह-शादियों, पर्व-त्यौहारों एवं पारिवारिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर भूखें लोगों के द्वारा भोजन की लूटपाट देखने को मिल रही है। भोजन की लूटपाट जहां मानवीय त्रासदी है, वही भोजन की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। एक तरफ करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन भोजन की बर्बादी एक विडम्बना है। एक आदर्श समाज रचना की प्रथम आवश्यकता है अमीरी-गरीबी के बीच का फासला खत्म हो। 

शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। होटलों में भी हम देखते हैं कि काफी मात्रा में भोजन जूठन के रूप में छोड़ा जाता है। एक-एक शादी में 300-300 आइटम परोसे जाते हैं, खाने वाले व्यक्ति के पेट की एक सीमा होती है, लेकिन हर तरह के नये-नये पकवान एवं व्यंजन चख लेने की चाह में खाने की बर्बादी ही देखने को मिलती हैं, इस भोजन की बर्बादी के लिये न केवल सरकार बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित है। 
भारतीय संस्कृति में जूठन छोड़ना पाप माना गया है। दूसरी ओर यहां तो अन्न को देवता का दर्जा प्राप्त है। लेकिन तथाकथित धनाढ्य मानसिकता के लोग अपनी परम्परा एवं संस्कृति को भूलकर यह पाप किये जा रहे हैं। सब अपना बना रहे हैं, सबका कुछ नहीं। और उन्माद की इस प्रक्रिया में खाद्यान्न संकट, भोजन की बर्बादी एवं भोजन की लूटपाट जैसी खबरें आती हैं जो हमारी सरकार एवं संस्कृति पर बदनुमा दाग हैं। 

यूं तो दुनिया के अनेकों मुल्कों में खाद्यान्न की लूटपाट एवं संकट की खबरें आती हैं, पर वहां भोजन की बर्बादी देखने की नहीं मिलती। भूखें लोगों द्वारा भोजन लूटने की घटनाओं से एक बड़ी मानवीय त्रासदी का पता चलता है। कोई व्यक्ति अपनी सूखती अंतड़ियों के साथ इस तरह मजबूर हो जाए कि या तो वह खुद को खत्म कर ले या फिर पड़ोसी की रोटी पर झपट पड़े, तो यह ऐसा दृश्य है, जिसे देखकर कोई भी बेचैन हो सकता है। एक तरफ यह नीतियों में भारी खामी का संकेत करती है, तो दूसरी तरफ सामाजिकता एवं संवेदनशीलता का अभाव दर्शाती है, जहां लोग अपने पड़ोस में भूख से तड़पते लोगों से बेखबर अपनी समृद्ध दुनिया में गाफिल रहते हैं। अमीरी-गरीबी की निरंतर चैड़ी होती खाई को नजरअंदाज करके दुनिया में खाद्यान्न का उपभोग हाल के वर्षों में दोगुने तक बढ़ा है, पर वजह यह नहीं है कि भूखे लोगों ने दो की बजाय तीन वक्त खाना शुरू कर दिया है। बल्कि खाने-पीने की चीजों में आई महंगाई ने दो अरब लोगों को भोजन के लिए छीनझपट तक के लिए मजबूर कर रखा है, यह संघर्ष असल में उनकी जिंदगी का सवाल है। इसलिये जरूरी है कि भूख से पहले गरीबी का इलाज हो।

दुनियाभर में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है उसका एक तिहाई भोजन बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों की खाने की जरूरत पूरी हो सकती है। विश्व भर में होने वाली भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष और विश्व खाद्य कार्यक्रम ने एकजुट होकर एक परियोजना शुरू की है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में बढ़ती संपन्नता के साथ ही लोग खाने के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं। खर्च करने की क्षमता के साथ ही खाना फेंकने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। समस्या की शक्ल लेती यह स्थिति चिन्ताजनक है और प्रधानमंत्री इसके लिये जागरूक है, यह एक शुभ संकेत है। 

राष्ट्रीय स्तर पर यदि चिंतन करें तो ज्ञात होगा कि भारत भी आज अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। जैसे भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण, स्वार्थमदान्धता के वशीभूत औरों के व्यक्तित्व और अस्तित्व का अपहनन, भौतिक प्रदर्शन-दिखावा, पदलिप्सा, सत्ता-शक्ति की भयावह भूख और मानवीय गुणवत्ता तथा नैतिक मूल्यों का निरन्तर ह्रास। इन सब समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में सूक्ष्म विश्लेषण करने के पश्चात् यह तथ्य हमारे सामने आता है कि अतृप्त महत्वाकांक्षाओं के खोखलेपन ने जीवन-निर्वाह की दीवारों को हिला दिया है, जिसकी चरमराहट से व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और संपूर्ण विश्व प्रभावित हो रहा है, क्योंकि आचरण की पवित्रता, न्याय-संगत नेतृत्व, मानवीय कल्याणकारी सद्भावनाएं, संयम और मर्यादित व्यवस्थाओं के परिवेश में ही सृजनात्मक क्षणों को उभारा जा सकता है और उन्हीं में किसी की भूख आपको आहत कर सकती है। इसी में आप भोजन की बर्बादी को रोककर कई लोगों का पेट भर सकते हैं। 

विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया का हर सातवां व्यक्ति भूखा सोता है। विश्व भूख सूचकांक में भारत का 67वां स्थान है। देश में हर साल 25.1 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है लेकिन हर चैथा भारतीय भूखा सोता है। इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के कारण खराब हो जाती हैं। विश्व खाद्य संगठन के मुताबिक भारत में हर साल पचास हजार करोड़ रुपए का भोजन बर्बाद चला जाता है, जो कि देश के खाद्य उत्पादन का चालीस फीसद है। इस अपव्यय का दुष्प्रभाव हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है। हमारा देश पानी की कमी से जूझ रहा है लेकिन अपव्यय किए जाने वाले इस भोजन को पैदा करने में इतना पानी व्यर्थ चला जाता है जिससे दस करोड़ लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। 

होटल-रेस्तरां के साथ ही शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में सैकड़ों टन भोजन बर्बाद हो रहा है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से ग्यारह किलो अन्न बर्बाद करता है। जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं, उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी-अनाज को सड़ने से बचा सकते हैं। इसलिये सरकार को चाहिए कि वह इन विषयों को गंभीरता से ले, नयी योजनाओं को आकार दे, लोगों की सोच को बदले, तभी नया भारत का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।

खाने की बर्बादी रोकने की दिशा में ‘निज पर शासन, फिर अनुशासन’ एवं ‘संयम ही जीवन है’ जैसे उद्घोष को जीवनशैली से जोड़ना होगा। इन दिनों मारवाड़ी समाज में फिजुलखर्ची, वैभव प्रदर्शन एवं दिखावे की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने एवं भोजन केेे आइटमों को सीमित करने के लिये आन्दोलन चल रहे हैं, जिनका भोजन की बर्बादी को रोकने में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। सरकार को भी शादियों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार करना चाहिए। दिखावा, प्रदर्शन और फिजूलखर्च पर प्रतिबंध की दृष्टि से विवाह समारोह अधिनियम, 2006 हमारे यहां बना हुआ है, लेकिन यह सख्ती से लागू नहीं होता, जिसे सख्ती से लागू करने की जरूरत है। धर्मगुरुओं व स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। घर की महिलाएं इसमें सहयोगी हो सकती है। खासकर वे बच्चों में शुरू से यह आदत डाले कि उतना ही थाली में परोसें, जितनी भूख हो। इस बदलाव की प्रक्रिया में धर्म, दर्शन, विचार एवं परम्परा का भी योगदान एक नये परिवेश को निर्मित कर सकता है। 

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