साक्षात्कार
3 मई विश्व प्रेस दिवस- प्रेस की आजादी और उस पर पाबंदियां
संतोश गंगेले
03/मई/2017(ITNN)>>>>>>> आज के ही दिन संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा ने 3 मई 1993 को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता की घोषणा की थी। यह घोषणा यूनेस्को महासम्मेलन के 26वें सत्र के दौरान हुई थी। इस aदिन प्रेस से संबंधित प्रस्तावों को स्वीकार किया गया था। इस दिन के मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकार के उल्लघंनों की गंभीरता के बारे में जानकारी देना है जैसे प्रकाशनों की काट-छाट, उन पर जुर्माना लगाना, प्रकाशन को निलंबित कर देना और बंद कर देना आदि।  इनके आवाला पत्रकारों, संपादकों, और प्रकाशको को परेशान किया जाता है और उन पर हमले भी किये जाते है। यह दिन प्रेस की आजादी को बढ़ावा देने और इसके लिए सार्थक पहन करने तथा दुनिया भर में प्रेस की आजादी की स्थिति का आकलन करने का भी दिन है।  

अधिक व्यावहारिक तरीके से कहा जाए तो प्रेस की आजादी या मीडिया की आजाद, विभिन्न इलेक्ट्रानिक माध्यमों और प्रकाशित सामग्री तथा फोटोग्राफी वीडियों आदि के जरिये संचार और अभिव्यक्ति की आजादी है। प्रेस की आजादी का मुख्य रूप से यही मतलब है कि शासन की तरफ से हममें कोई दखलंदाजी न हो।  लेकिन संवैधानिक तौर पर और अन्य कानूनी प्रावधानों के जरिये भी प्रेस की आजादी की रक्षा जरूरी है। मीडिया की आजादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय या बात कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इस जाहिर करने का अधिकार है। इस आजादी में बिना किसी दखलंदाजी के अपनी राय कायम करने और सूचना देने की आजादी शामिल है।  इसका उल्लेख मानवअधिकारों की सार्वभौतिक घोषणा के अनुछेद-19 में विस्तार किया गया है। सूचना संचार प्रौद्योगिकी तथा सोशल मीडिया के जरिए थोड़े समय के अंदर अधिक से अधिक लोगों तक सभी तरह की महत्वपूर्ण खबरें पहुंच जाती है। यह समझाना भी उतना ही महत्व पूर्ण है कि सोशल मीडिया की सक्रियता से इसका विरोध करने वालो को भी स्वयं को संगठित करने के लिए बढावा मिला है।  और दुनिया भर के युवा लोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए और व्यापाक रूप से अपने समुदायों की आकांक्शाओं की अभिव्यक्ति  के लिए संघर्श करने में लगे है। इसके साथ ही यह भी समझना भी जरूरी है कि मीडिया की आजादी बहुत कमजोर है यह भी जानना जरूरी है कि अभी यह सभी की पहुंच से बाहर है हालांकि मीडिया की सच्ची आजादी के लिए माहौल बन रहा है। यह भी इसकी वास्तविकता है कि दुनिया में कई लोग ऐसे है जिनकी पहुंच बुनियादी संचार प्रौद्योगिकी तक नही है, जैसे-जैसे इंटरनेट पर खबरों और रिपोर्टिंग का सिलसिला बढ़ रहा है। ब्लॉग लेखकों सहित और अधिक इंटरनेट पर पत्रकारों को परेशान किया जा रहा है और हमले किए जा रहे है।          
          
भारत जैसे विकासशील देश में मीडिया पर जातिवाद और संप्रदायवाद जैसे संकुचित विचारों के खिलाफ संघर्ष करने और गरीबी तथा अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई में लोगों की सहायता करने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग पिछड़ा और अनभिज्ञ है। इसलिए यह और भी जरूरी है कि आधुनिक विचार उन तक पहुचांए जाऐं और उनका पिछड़ापन दूर किया जाए ताकि वे सजग भारत का हिस्सा बन सकें। इस दृष्टि से मीडिया की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है । भारत में संविधान के उपखंण्ड 2 के अनुसार भारत की संप्रभुता और अखंडता, राष्ट्र की सुरक्षा, विदेशो के साथ मैत्री संबधों, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के संरक्षण, न्यायालय की अवमानना, बदनामी और अपराध के लिए उकसाने जैसे मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पांबदी भी लगाई गई है । 

प्रेस से जुड़े मीडिया कर्मी का दायित्व बनाता है कि वह सामाजिक कार्यो में भी प्राथमिकता से सहभागीदार बनकर देश और राष्ट्र सेवा कर सकते है। भारत देश में अशिक्षा के अंधकार को मिटाने के लिए पत्रकारों को प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया, सोशल मीडिया के माध्यम से शिक्षा का प्रचार- प्रसार  बहुत जरूरी है। हमारे भारतीय इतिहास में आजादी के पूर्व की पत्रकारिता में पं. दीनदयाल उपाध्याय, बालगंगाधर तिलक, मुंशी प्रेमचन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मदन मोहन मालवीय, अंविका प्रसाद वाजपेयी, बाबू राव, विश्णु पराड़कर, आचार्य शिवपूजन सहाय, राजेन्द्र माथुर, राजाराम मोहन राय, गणेशशंकर विद्यार्थी, पं. माखन लाल चतुर्वेदी, प्रभाश जोशी आदि महान पत्रत्रकारों ने अपनी लेखनी से देश को आजादी दिलाई वहीं महिला पत्रकारों में सर्व प्रथम 1908 में रविन्द्र नाथ ठाकुर की बहन स्वर्ण कुमारी देवी ने भारती नामक पत्रिका का संपादन किया था उसके बाद ऊषा मेहता ने आजादी में पत्रकारिता की उन्हे जेल तक जाना पड़ा। हमारा इतिहास साक्षी है भारत में सबसे हिन्दी समाचार पत्र 30 मई 1930 को उदंत मार्तण्ड समाचार पत्र युगलकिशोर शुक्ल ने प्रकाशित किया । 

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक -हिन्दी स्वराज का संपादन करते हुये कहा कि पत्रकार और पाठक के बीच होना चाहिए। जब वह दक्शिण अफ्रीका से भारत आने वाले थें तो उन्होने एक बाद कहा था कि समाचार पत्र सेवा भाव से ही चलाना चाहिए।  समाचार पत्र एक जबर्दस्त शक्ति है। उनका विचार था कि समाचार पत्र में पाठक के विचारों को भी स्थान मिलना चाहिए। 

आजादी के बाद महिला पत्रकारों ने पुरूषो के समान पत्रकारिता में अपनी सहभागीदारी का निर्वाहन किया प्रिंट मीडिया के साथ-साथ रेडियो, टी.वी. दूरदर्शन,  सेटेलाईट चैनल, सोशल मीडिया में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। महिलाओं में अनुभा भौंसले ने द इंडियन एक्सप्रेस से अपनी पत्रकारिता की शुरूआत की थी, जो आईएनडीटी में एंकर रही और अमृता चौधरी जैसे कर्मठ पत्रकारों ने अपना स्थान बनाया। पिछले दो वर्षों में भारत सरकार ने भारतीय महिला पत्रकारों के राष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन कराये जिसमें देश के 120 पत्रकार संगठनों से 250 से अधिक महिलाओं ने विभिन्न चरणो में अपने विचारों से पत्रकारिता को शिखर पर लाने की बातें कहीं । 

भारत देश सहित मध्य प्रदेश में विभिन्न पत्रकार संगठन कार्य कर रहे है लेकिन भारत देश के शहीद पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी के नाम से संचालित गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब मध्यप्रदेश ने मध्यप्रदेश के अंदर प्रेस से जुडे़ पत्रकारों के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र में अच्छे कार्य करने वाले नागरिको, अधिकारियों, कर्मचारियों, पत्रकारों, समाजसेवी व्यक्तियों को विभिन्न जिला स्तर पर सामाजिक आयोजन कर उनको सम्मानित किया। संगठन के संस्थापक अध्यक्ष संतोश गंगेले ने छतरपुर एवं टीकमगढ़ जिला के विभिन्न जनपद पंचायतो के क्षेत्र में कक्षा 1 से 12 तक के संचालित शिक्षण संस्थाओं में भारतीय संस्कृति, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं, स्वच्छ भारत अभियान को संचालित कर देश और देश के अंदर जन जाग्रति अभियान की अलख जगाई है ।