साक्षात्कार  :: समाज के प्रहरी
बड़ी अदालत में बड़ा अन्याय
भारत की अदालतें जादू-टोना घर बनी हुई हैं। भारत-जैसे पूर्व गुलाम देशों की यही दुर्दशा है। अंग्रेजों की बनाई (अ) न्याय-व्यवस्था अभी तक ज्यों की त्यों चल रही है। विख्यात अंग्रेज विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा था कि देर से किया गया न्याय तो अन्याय ही है। भारत की अदालतों में 3-4 करोड़ मुकदमे लटके पड़े हुए हैं, 30-30 साल से! पहली बात तो न्याय में देरी होती है और न्याय भी ऐसा होता है कि मुकदमा लड़ने वालों को यह पता ही नहीं चलता कि वे हारे हैं तो क्यों हारे हैं और जीतें हैं तो क्यों जीते हैं? ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हमारा कानून, हमारी बहस, हमारे फैसले- सब कुछ अंग्रेजी में होते हैं।
3 मई विश्व प्रेस दिवस- प्रेस की आजादी और उस पर पाबंदियां
आज के ही दिन संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा ने 3 मई 1993 को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता की घोषणा की थी। यह घोषणा यूनेस्को महासम्मेलन के 26वें सत्र के दौरान हुई थी। इस दिन प्रेस से संबंधित प्रस्तावों को स्वीकार किया गया था। इस दिन के मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकार के उल्लघंनों की गंभीरता के बारे में जानकारी देना है जैसे प्रकाशनों की काट-छाट, उन पर जुर्माना लगाना, प्रकाशन को निलंबित कर देना और बंद कर देना आदि। इनके आवाला पत्रकारों, संपादकों, और प्रकाशको को परेशान किया जाता है और उन पर हमले भी किये जाते है। यह दिन प्रेस की आजादी को बढ़ावा देने और इसके लिए सार्थक पहन करने तथा दुनिया भर में प्रेस की आजादी की स्थिति का आकलन करने का भी दिन है।
भारत में एक फादर टेरेसा भी है
मैं उज्जैन के सेवाधाम में था। इसे सुधीर गोयल 20-22 साल से चला रहे हैं। यहां लगभग 500 बच्चे, औरतें, जवान और बूढ़े रहते हैं। इनमें से कई विकलांग हैं, अंधे, बहरे, लूले-लंगड़े, लकवाग्रस्त! कुछ परित्यक्त महिलाएं और अभिशप्त लोग भी यहां रहते हैं। सुधीरजी इन सब लोगों के लिए भोजन, निवास, कपड़े, दवा, शिक्षा, खेल-कूद आदि का सारा इंतजाम करते हैं। इस आश्रम के पहले अध्यक्ष प्रसिद्ध कवि डा. शिवमंगल सिंह सुमन थे।
नक्सली हमलाः सरकारों का कायराना रवैया
छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुआ जवानों का नर-संहार पहला नहीं है। कश्मीर में जितने लोग मारे जाते हैं, उससे ज्यादा और उससे बुरी तरह छत्तीसगढ़ के जंगलों में मारे जा रहे हैं। इन नक्सलियों को हम आतंकी क्यों नहीं घोषित करते? कश्मीर में खून बहाने वालों और छत्तीसगढ़ में खून बहाने वालों में हम फर्क क्यों करते हैं? छत्तीसगढ़ जब से बना है, याने 2000 से अब तक 11 सौ से ज्यादा जवान मारे गए हैं।
कश्मीरी हमारे भाई हैं
कश्मीर के हालात काफी बिगड़ रहे हैं लेकिन इसके बावजूद आशा की कुछ किरणें उभर रही हैं। एक तरफ पत्थरफेंकू घटनाओं की तादाद बढ़ती जा रही है, चुनाव में हुआ मतदान बुरी तरह से घट गया है और पीडीपी-भाजपा गठबंधन तनाव के अंतिम छोर पर पहुंच गया है और दूसरी तरफ गृह मंत्री राजनाथ सिंह और राजस्थान की मुख्यमंत्री ने खुली अपील जारी की है कि कश्मीरी नागरिकों के साथ कोई बदसलूकी नहीं की जाए।
हमारे मुसलमान भी क्या मुसलमान हैं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन तलाक के सवाल को बड़ी संजीदगी के साथ उठाया है। उन्होंने बहुत दबी जुबान से मांग की है कि हमारी मुस्लिम बहनों के साथ न्याय होना चाहिए। उन्होंने साथ-साथ यह भी कह दिया कि इस मुद्दे पर मुस्लिम समाज में उठा-पटक नहीं होनी चाहिए। इस उठा-पटक की आशंका सबको ही है, क्योंकि मजहबी कट्टरपंथी, चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय के हों, वे अपना दिमाग ताक पर रखकर सोचते हैं। वे लकीर के फकीर होते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि मजहब इंसानों के लिए नहीं होता बल्कि इंसान मजहब के लिए होते हैं। न तो वे यह फर्क कर सकते हैं कि धर्म या मजहब में कौनसी बात सार्वदेशिक और सार्वकालिक है और न ही कौन सी बात देश और काल की सीमा से बाधित है?
नेता और दल हो गए हैं आलसी
इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन को लेकर 13 विरोधी दलों के नेताओं ने राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया है। उनका कहना है कि इन मशीनों ने धांधली मचा रखी है। उसी के कारण भाजपा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव में प्रचंड बहुमत से जीत गई। अब दिल्ली में हो रहे स्थानीय चुनावों को लेकर भी इसी तरह की आशंकाएं जाहिर की जा रही हैं। इन विरोधी नेताओं ने गोरक्षकों और रोमियो-बिग्रेड के बारे में भी राष्ट्रपति से शिकायत की है।
वंदे मातरम इस्लाम-विरोधी नहीं
वंदे मातरम को लेकर फिर बहस छिड़ गई है। मेरठ, इलाहाबाद और वाराणसी की नगर निगमों के कुछ पार्षदों ने इस राष्ट्रगान को गाने पर एतराज किया है। इसे वे इस्लाम-विरोधी मानते हैं। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यह सोच चिंता का विषय है। मुझे पता नहीं कि योगीजी को वंदे मातरम के इतिहास की कितनी जानकारी है लेकिन वे चाहें तो अपने देश के मुसलमान भाइयों से दो-टूक शब्दों में कह सकते है कि वंदे मातरम इस्लाम-विरोधी बिल्कुल नहीं है।
दलाई लामा पर चीन की चिढ़न
दलाई लामा की तवांग-यात्रा पर चीन की चिढ़न समझ के परे है। यह उनकी छठी तवांग-यात्रा है। चीन ने पहले भी शोर मचाया है लेकिन इस बार उसकी सरकार तो सरकार, उसके भारत स्थित राजनयिक, उसके प्रोफेसरगण और उसके कई महत्वपूर्ण अखबार मानो एक साथ भारत-विरोधी समूह-गान में जुटे हुए हैं। वे भारत के अरुणाचल प्रदेश में स्थित तवांग को ‘दक्षिणी तिब्बत’ कहते हैं और उसे चीन का हिस्सा मानते हैं, क्योंकि तिब्बत चीन का हिस्सा है।
एक मुस्लिम नास्तिक की हत्या
तमिलनाडु के कोयंबतूर में एक 31 वर्षीय मुस्लिम नौजवान की हत्या कर दी गई। उसका नाम फारुक था। उसकी हत्या इसलिए हुई कि वह नास्तिक था। वह अपनी वेबसाइट पर मजहबी मुद्दों के बारे में खुलकर लिखा करता था। वह अपने सैकड़ों साथियों को अक्सर व्हाट्सअप भेजा करता था। उसकी हत्या किसने की? उन लोगों ने की, जो अपने आप को इस्लाम के सिपाही मानते हैं। याने कुछ कट्टर मुसलमानों ने फारुक को उसकी काफिराना हरकत की सजा दे दी।
बिजली की कमी से बहाना मिला कामचोरों को
बढ़ते कंप्यूटरीकरण की उपयोगिता ने अर्कमण्य कर्मचारियों को बिजली की कमी ने वह हथियार दे दिया है जिसमें वे बेकार बैठ कर जीना जान गये है। जनता को परेशान करने की वही पुरानी बीमारी को उन्होंने उसी तरह अपनाया है जैसे भ्रष्टाचार की बुराई करते हुए भ्रष्टाचार करना। जब कार्य करना होता है, वे तो मिलते नहीं। जब मिलते है, तो बिजली होती नहीं। बिजली है तो जनता को दुत्कार कर बाहर करने के सारे तरीके अपनाने के उपरान्त कार्य न होने के एक से बढ़कर एक बहाने बेसिरपैर के कुतर्क के साथ उनके पास हमेशा तैयार रहते है। भारतीयों के अच्छे दिन की सम्भावनाओं में जो ग्रहण शुरु होने से पहले ही विपक्ष ने लगाया वह इन कर्मचारियों के लिये वरदान साबित हुआ है।
एक योगी का मुख्यमंत्री बनना!
योगी आदित्यनाथ को उप्र का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया है, इस तथ्य ने सबको आश्चर्य में डाल दिया है, जैसा कि वहां के चुनाव-परिणामों ने डाल दिया था लेकिन उप्र के चुनाव-परिणाम और योगी की नियुक्ति में सहज-संबंध का एक अदृश्य तार जुड़ा हुआ है। आप पूछें कि उप्र में भाजपा कैसे इतना चमत्कार दिखा सकी तो इसका एक ही बड़ा उत्तर है कि वहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ। हिंदुओं ने नोटबंदी की तकलीफों को भुला दिया। उन पर फर्जीकल स्ट्राइक का भी कोई फर्क नहीं पड़ा। मोदी विकास के नाम पर भी शून्य थे लेकिन फिर भी बाजी मार ले गए।
मध्यम-वर्ग: नई भोर की आहट
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने देश को एक उजाला दिया है, एक संभावनाओं भरी उजली सुबह दी है। यही कारण है कि पहली बार मध्यम वर्ग की चिन्ता किसी राष्ट्रनायक ने की है। गरीबी को खत्म करके मध्यम वर्ग पर लगातार लादे जा रहे बोझ को कम करने का उनका फार्मूला भी व्यावहारिक है। एक संतुलित एवं आदर्श समाज निर्माण के लिये इसकी जरूरत भी थी और वक्त का तकाजा भी। लगातार इस वर्ग की उपेक्षा के छाए घनघोर बादल अब छंटते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस आदर्श स्थिति की तरफ बढ़ते कदम निश्चित ही ‘नया भारत’ के संकेत दे रहे हैं।
सेवा के नाम पर मेवा
देश में लगभग 33 हजार समाजसेवी संस्थाएं हैं, जो विदेशी पैसों पर पल रही हैं। इनमें से 20 हजार संस्थाओं का हुक्का-पानी सरकार ने बंद कर दिया है। उसने ऐसा क्यों किया है, यह उसे विस्तार से बताना चाहिए। जाहिर है कि इन संस्थाओं के हिसाब-किताब में गड़बड़ी पाई गई है लेकिन यह तो मामूली कारण है। यदि उनकी चंदाबंदी का कारण यही है तो वे अपने बही-दस्तरे जल्दी ही ठीक कर लेंगी। तो क्या सरकार उन्हें फिर से विदेशी चंदा लेने की इजाजत दे देगी?
तेरा अल्लाह, मेरे भगवान से अलग है क्या?
कर्नाटक के मंगलूर शहर की एक युवा गायिका सुहाना सईद पर कुछ कट्टरपंथी इसलिए बरस पड़े कि वह भगवान व्यंकटेश की स्तृति में भजन गा रही थी। मुश्किल यह हुई कि वह मुसलमान है। कट्टरपंथियों ने सोशल मीडिया पर सुहाना के विरुद्ध जिहाद छेड़ दिया है। उनका आरोप है कि वह अपनी खूबसूरती की बेजा नुमाइश कर रही थी। वह मर्दों के सामने गा कर इस्लामी परंपरा का उल्लंघन कर रही थी। उसे इतना डराया-धमकाया गया कि उसे इन मजहबी तत्वों के खिलाफ पुलिस में रपट लिखानी पड़ी।
नारी अस्तित्व एवं अस्मिता पर धुंधलके क्यों?
सम्पूर्ण विश्व में नारी के प्रति सम्मान एवं प्रशंसा प्रकट करते हुए 8 मार्च का दिन उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में, उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन से पहले और बाद में हफ्ते भर तक विचार विमर्श और गोष्ठियां होंगी जिनमें महिलाओं से जुड़े मामलों जैसे महिलाओं की स्थिति, कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती घटनाएं, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, गांवों में महिला की अशिक्षा एवं शोषण, महिलाओं की सुरक्षा, महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराध को एक बार फिर चर्चा में लाकर वाहवाही लूट ली जायेगी।
हमारी भी सुनो ......
बात सिर्फ महिलाओं के सुरक्षा की थी, ससम्मान जीवन यापन की थी लेकिन क़ानून बनाने वाले महारथी आपसी राजमंदी से सम्बन्ध बनाने पर भिड़ गए... उल्लेखनीय है कि एंटी रेप बिल तैयार करने के लिए बनाई गयी समिति के सदस्यों में एक मात्र कृष्णा तीरथ महिला सदस्य थी जिनकी बात सूनी ही नहीं गयी।